Tuesday, September 25, 2012

भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र की हिन्दी-विषयक दुविधा

21वीं सदी के पहले भारत में डीम्ड विश्वविद्दालय कम ही थे। अधिकाँश विश्वविद्दालयों का कार्य महाविद्दालयों को संबद्धता प्रदान करना था। लगभग हर महाविद्दालय में हिन्दी विभाग और उनमें से प्रत्येक में हिन्दी के कुछ प्राध्यापक हुआ करते थे। जाने कितने ऐसे हिन्दी के प्राध्यापक हुए जिन्होने हिन्दी का पाठ्यक्रम चलाने और वेतन उठाने से ज्यादा हिन्दी भाषा के लिए कुछ नहीं किया। ऐसे प्राध्यापकों में से कई ने पी0एच0डी0 की डिग्री प्रदान करने का भी कार्य बखुबी किया। जब सर्वोच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षक ऐसे हों, जिनका न लेखन से कोई वास्ता रहा, न गुणवत्तापूर्ण शोध से और न ही हिन्दी के प्रसार से, तो उनके मानस-पुत्र कैसे होंगे यह सोचने वाली बात है।
हिन्दी की रोटी खानेवालों की बड़ी जमात उच्च शिक्षा संस्थानों से जुड़ी रही है। इसकी टोपी उसके सर करते हुए और एक-दुसरे की टाँग खिंचते हुए पुरस्कार हासिल करना इनमें से कईयों के जीवन का मकसद रह गया था। हिन्दी दिवस पर हिन्दी की दुर्दशा पर आँसू बहानेवालों ने हिन्दी के वृहत्तर लाभ के लिये (दुसरे भाषा-प्रेमीयों से सिखकर भी) खुद कभी कोई आमरण अनशन नहीं किया।
हिन्दी भाषा को स्थापित करने के नाम पर क्या-क्या अनर्थ नहीं किया गया। अंग्रेजी से दुरी बनाने से शुरुआत की गयी, फिर संस्कृत-उर्दु समेत बाकी के सभी भारतीय भाषाओं से दुरी बनायी गयी। ऐसा करते हुए राजस्थानी से लेकर मैथिली तक संबंध-विच्छेद कर्ते हुए हिन्दी को कूपमंडुक और अ-समाजिक स्तर तक पहुँचा दिया गया। जबकि करना यह था कि हिन्दी इन सब को अपना अंग स्वीकार करते हुए, सभी भारतीय भाषाओं और बोलीयों को यथासम्मान जोड़ने का काम करती, ऐसा करते हुए अपनी स्वीकार्यता को बढ़ाती तो स्वतः ही आज एक विश्व भाषा के पद पर होती। उदाहरण के लिए तमिल, गुजराती और भोजपुरी भाषीयों की विश्व भर में अच्छी-खासी संख्या है जो हिन्दी की तरफ से बहुत आशान्वित नहीं है।
किया यह गया कि हिन्दी को पुरस्कारों, सरकारी राजभाषा विभागों और प्राध्यापकों-शिक्षकों की बहाली से आगे बढ़ने ही नहीं दिया गया। परिणामस्वरुप आज इंटरनेट के युग में हिन्दी के प्राध्यापक को बहाली समेत तमाम आवेदन-पत्र अंग्रेजी में ही देने पड़ते हैं। कुछ लोग सिनेमा और मीडिया के बदौलत आज हिन्दी को प्रसारित होने पर गर्वान्वित होते हैं उन्हें मूल स्क्रिप्ट-लेखकों और हिन्दी मीडियाकर्मियों की दुर्दशा की ओर भी एक नजर देख लेना चाहिए। कितने हिन्दी-डिग्रीधारी यहाँ काम करते हैं और कितने वस्तुतः हिन्दी बोलते हैं यह एक अलग शोध का विषय है।
1950 के दशक में चिकित्सा-अभियाँत्रिकी जैसे विषयों में हिन्दी में शोध-पत्र लिखने का चलन डेढ़ दशक में ही दम तोड़ चुका था उसके लिए भी हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों में बैठे स्वयंभू हिन्दी विद्वतगण कम जिम्मेवार नहीं हैं। तमाम विषयों के पारिभाषिक पदों की जो दुरुह-अनुपयोगी हिन्दी पदावली बनायी गयी उसका विरोध में कभी कोई हस्ताक्षर-अभियान भी शायद ही चला हो। इनके द्वारा हिन्दी एक दुधारु गाय की तरह दुहा गया दुसरी ओर जम कर छल भी किया गया।

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