Tuesday, September 25, 2012

जल ही जीवन है,

जल ही जीवन है,
जाना है मैने - बि0के0वि0 मे आकर।
फरवरी में हुआ पीलियाग्रस्त मैं,
तो विश्वविद्दालय प्रशासन को दिया आवेदन॥

नहीं हुई सुनवाई तो किया इ-मेल,
जवाब मे 5 लीटर का डब्बा आया।
50 आदमी, 5 ली0 का एक डब्बा,
कुल बोझ बेचारा चपरासी उठाया॥

प्यास लगे तो पेप्सी पी
कैन्टीन क्यो खोल रखा है!
बीमार पड़े तो बिल जमा कर,
बीमा क्यो करवा रखा है!

बीत गए मास 14,
बीमा कार्ड का स्पेलिंग ठीक न कराया जा सका।
बीमा की सुविधा कैसे मिलनी है,
इसका विवरण अभी तक न मिल सका।।

भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र की हिन्दी-विषयक दुविधा

21वीं सदी के पहले भारत में डीम्ड विश्वविद्दालय कम ही थे। अधिकाँश विश्वविद्दालयों का कार्य महाविद्दालयों को संबद्धता प्रदान करना था। लगभग हर महाविद्दालय में हिन्दी विभाग और उनमें से प्रत्येक में हिन्दी के कुछ प्राध्यापक हुआ करते थे। जाने कितने ऐसे हिन्दी के प्राध्यापक हुए जिन्होने हिन्दी का पाठ्यक्रम चलाने और वेतन उठाने से ज्यादा हिन्दी भाषा के लिए कुछ नहीं किया। ऐसे प्राध्यापकों में से कई ने पी0एच0डी0 की डिग्री प्रदान करने का भी कार्य बखुबी किया। जब सर्वोच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षक ऐसे हों, जिनका न लेखन से कोई वास्ता रहा, न गुणवत्तापूर्ण शोध से और न ही हिन्दी के प्रसार से, तो उनके मानस-पुत्र कैसे होंगे यह सोचने वाली बात है।
हिन्दी की रोटी खानेवालों की बड़ी जमात उच्च शिक्षा संस्थानों से जुड़ी रही है। इसकी टोपी उसके सर करते हुए और एक-दुसरे की टाँग खिंचते हुए पुरस्कार हासिल करना इनमें से कईयों के जीवन का मकसद रह गया था। हिन्दी दिवस पर हिन्दी की दुर्दशा पर आँसू बहानेवालों ने हिन्दी के वृहत्तर लाभ के लिये (दुसरे भाषा-प्रेमीयों से सिखकर भी) खुद कभी कोई आमरण अनशन नहीं किया।
हिन्दी भाषा को स्थापित करने के नाम पर क्या-क्या अनर्थ नहीं किया गया। अंग्रेजी से दुरी बनाने से शुरुआत की गयी, फिर संस्कृत-उर्दु समेत बाकी के सभी भारतीय भाषाओं से दुरी बनायी गयी। ऐसा करते हुए राजस्थानी से लेकर मैथिली तक संबंध-विच्छेद कर्ते हुए हिन्दी को कूपमंडुक और अ-समाजिक स्तर तक पहुँचा दिया गया। जबकि करना यह था कि हिन्दी इन सब को अपना अंग स्वीकार करते हुए, सभी भारतीय भाषाओं और बोलीयों को यथासम्मान जोड़ने का काम करती, ऐसा करते हुए अपनी स्वीकार्यता को बढ़ाती तो स्वतः ही आज एक विश्व भाषा के पद पर होती। उदाहरण के लिए तमिल, गुजराती और भोजपुरी भाषीयों की विश्व भर में अच्छी-खासी संख्या है जो हिन्दी की तरफ से बहुत आशान्वित नहीं है।
किया यह गया कि हिन्दी को पुरस्कारों, सरकारी राजभाषा विभागों और प्राध्यापकों-शिक्षकों की बहाली से आगे बढ़ने ही नहीं दिया गया। परिणामस्वरुप आज इंटरनेट के युग में हिन्दी के प्राध्यापक को बहाली समेत तमाम आवेदन-पत्र अंग्रेजी में ही देने पड़ते हैं। कुछ लोग सिनेमा और मीडिया के बदौलत आज हिन्दी को प्रसारित होने पर गर्वान्वित होते हैं उन्हें मूल स्क्रिप्ट-लेखकों और हिन्दी मीडियाकर्मियों की दुर्दशा की ओर भी एक नजर देख लेना चाहिए। कितने हिन्दी-डिग्रीधारी यहाँ काम करते हैं और कितने वस्तुतः हिन्दी बोलते हैं यह एक अलग शोध का विषय है।
1950 के दशक में चिकित्सा-अभियाँत्रिकी जैसे विषयों में हिन्दी में शोध-पत्र लिखने का चलन डेढ़ दशक में ही दम तोड़ चुका था उसके लिए भी हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों में बैठे स्वयंभू हिन्दी विद्वतगण कम जिम्मेवार नहीं हैं। तमाम विषयों के पारिभाषिक पदों की जो दुरुह-अनुपयोगी हिन्दी पदावली बनायी गयी उसका विरोध में कभी कोई हस्ताक्षर-अभियान भी शायद ही चला हो। इनके द्वारा हिन्दी एक दुधारु गाय की तरह दुहा गया दुसरी ओर जम कर छल भी किया गया।

मुझे याद कर लेना

शब्द-चित्र : मुझे याद कर लेना
मीडिया का एक विद्दार्थी आज चुक गया क्योंकि उसके पास एक कैमरा नहीं था। 2003 मोडल के मोबाईल में एक साधारण सा कैमरा है भी तो ‘व्यक्तिगत नैतिकता’ आड़े आ गयी। वह सोंच रहा है कि बाबा आदम के जमाने के लेखकों की बराबरी तो नहीं कर सकता लेकिन शब्द-चित्र खिंचने का प्रयास तो कर ही सकता है।
      पटना शहर की सबसे चकाचक, मशहुर और संभवतः सबसे चौड़ी सड़क को बेली रोड कहा जाता है। डाकबंगला चौराहे से शुरू होकर सगुना मोड़ तक बीच में इनकम टैक्स भवन, हाई कोर्ट, पटना वीमेंस कालेज, सचिवालय, बिहार लोक सेवा आयोग, चिड़ियाखाना, गोल्फ क्लब, जे0डी0वीमेंस कालेज तक ज्यादातर सरकारी परिसर हैं। इसके बाद शेखपुरा, राजाबाजार, रूकनपुरा आदि रिहायशी इलाके हैं। इस सड़क से समांतर तीन कि0मी0 उत्तर अशोक राजपथ है और दो कि0मी0 दक्षिण खगौल-पटना स्टेशन-गुलजारबाग स्टेशन रोड, जिसे पूरानी बाइपास भी कहा जाता है।
      प्रतिदिन पटना के तमाम रईसों की दस हजार से अधिक कारें और एक लाख के लगभग दुपहिया-तिनपहिया गाड़ियाँ पटना की लाइफलाइन कही जाने वाली इस सड़क से दिन में गुजरती हैं, तो रात मे दस हजार से अधिक ट्रक। इसी सड़क पर शास्त्रीनगर-थाना-रोड और जे0डी0विमेंस कालेज के बीच शेरूल्लाहपुर नामक मुहल्ले की निकास गली है। उस दिन मंगलवार था। सुबह के दस बजे थे। इस मोड़ पर पानी की भूमिगत पाइप फुटी हुई थी। एक आदमी अपनी आटोरिक्‍शा धो रहा था। वहीं कुछ बच्चे अपने सपनों के जलविहार मे जलक्रिड़ा कर रहे थे।
      उस सड़क-सुलभ आम-जनता-तालाब के एक ओर एक कचरा चुननेवाले किसी व्यक्ति का चुने गये कचरे का बड़ा-सा गट्ठर रखा हुआ था। उसके ऊपर सुखाने के लिए कुछ कपड़े रखे हुए थे। आटोरिक्‍शा की आड़ लेकर एक आदमी नहा रहा था। वह नंग-धड़ंग था – पुर्णतः। शायद उसी आदमी के कपड़े सूख रहे थे गट्ठर के ऊपर। पटना शहर में भी दिख रहा था – नंगा नहाएगा क्या निचोड़ेगा क्या ?
      पटना में बाइकर उसे कहते हैं जो असाधारण तरीके से असाधारण गति से असाधारण आवाज के साथ मोटरसाइकिल चलाते हैं। पूरे भारत में उच्च क्षमता और अधिक-से-अधिक किमत के मोटरसाइकिल बेचे जा रहे हैं। इसमें सरकार को कई फायदे होते हैं। सरकार को ज्यादा किमत पर ज्यादा टैक्स मिलता है, इसलिए ऐसी मोटरसाइकिलें बिकवा रही है। फिर जब वह बाइकिंग करता है तो कटेगा-पिटेगा तो सरकार के फायदे के नए दरवाजे खोलेगा। अमीर का वह बच्चा सरकारी अस्पताल में जाने लायक रहेगा नहीं, इसीलिए निजी अस्पताल में जाकर सरकार को सेवा कर देगा। हथियार-व्यवसायी की तरह सरकार फिर फायदे में रहेगी क्योंकि दुर्घटना के बाद सरकार को और भी कई कर मिलेंगे, जैसे दवा खरीदने पर बिक्री कर और सबसे प्यारी पुलिस को मिलने वाली अंडर-टेबुल कर। इसलिए सरकार सिर्फ उच्च क्षमता की मोटरसाइकिलें बिकवाती है, उनके चलने लायक सड़क, विशेष ट्रैक, रेसिंग ग्राउंड देशभर मे कभी कहीं नहीं बनवाती। आम पटनावासी इन बाइकरों से से वैसे ही डरते हैं जैसे पूराने जमाने के गब्बर डाकूओं से डरते थे। उन्हीं डकूओं की तरह ये कभी अकेले नहीं होते, हमेशा झुँड में ही रहते हैं। पुराने डाकुओं की तरह इन बाइकरों का भी कोई पुलिस कभी बाल भी बाँका नहीं करती, एस0पी0 से डी0जी0पी0 तक चाहे जितना भी मीडिया मे गिदड़भभकी दे लें। और तीसरी और महत्त्वपूर्ण बात, पलभर में गले की चेन तो क्या जिन्दा लड़की को लेकर गायब हो जाने में ये महारथी होते हैं।
      एक बाइकर उस गरीब के गट्ठर को ठोकर मारते हुए चला गया। आज्ञाकरी घोड़े की तरह बाइक भी उछलकर पार हो गया। लेकिन उस गट्ठर का सामान, मुँह अंधेरे उठकर खाली पाँव घुम-घुमकर चुना हुआ कचरा, सड़क पर दूर-दूर तक फैल गया – करीब पचास फीट की दुरी में।
      फिर क्या था, पेट के आगे इज्जत कौन देखता है। वह भी उस महान धरती पर जहाँ हारने के बाद बेटी देकर राजा बने रहने की परंपरा आज भी चुनावी टिकट के लिए निभायी जाती हो। उस गरीब को कपड़े कौन देता जिसे पहनकर वह अपने कुड़े को समेटने जाए। जैसे ही उसने देखा कि उसकी उस दिन की कमाई कारों तले रौंदी-उड़ाई जा रही है वह जन्मभेष में ही बिजली की स्फुर्ति से कुड़े चुनने लगा। कारें धीमी हो गयीं लेकिन नजारा उद्वेलित करने वाला था। लोगों को जाम दिख रहा था। वातानुकुलित कारों के अंदरवालों को वह आदमी पागल दीख रहा था, जो विकसित लोगों को अपना नंगापन दिखा रहा था। पर सभ्य समाज को उसके नंगेपन में अपने नंगेपन की कोई झलक नहीं दीख रही थी। लोगों को चमचमाती कारों वाली बेली रोड पर बिखरे हुए कचरे सड़क की खुबसुरती को खराब करते हुए दीख रहे थे। गाड़ियों पर बैठे हजारों रुपए प्रतिदिन कमाने वालों को बीस रुपे प्रतिदिन कमाने वाले का परिश्रम पागलपन दिख रहा था। विकसीत बिहार के मुँह पर एक जबर्दस्त थप्पड़ लगा रहे थे उसके पाँच मिनट की नग्न-दौड़।
      वह इधर-उधर दौड़ता-भागता और कचड़े को उठा-उठाकर वापस बोरे में भरता। उसकी पाँच मिनट की भागमभाग में सड़क पर पाँच सौ मीटर लंबा जाम लग गया था। नौजवान बाइकरों को हुँकार भरने और अश्लील हुल्लड़्बाजी करने का तो जैसे मौका ही मिल गया था। वह गरीब बुदबुदा रहा था – मेरी यही कमाई है। यही आज की रोटी का आसरा है – भले ही बीस रुपये का ही हो। हे नौजवान! मेरी मदद तो तुम कभी नहीं ही करोगे, न ही भगवान करेंगे। पर नौकरी में ज्वानिंग के एक घंटे पहले कभी तेरी फाइल इसी तरह छितरा जाए या नदी में गिर जाए तो मुझे याद कर लेना। वेतन के पैसे पाकेटमार ले जाए तो मुझे याद कर लेना। एक वोट से हार जाना तो मुझे याद कर लेना। रेस्टुरेंट में खाने के टेबुल पर बैठे रहोगे और भुकंप आ जाए तो मुझे याद कर लेना। नक्सलवादी क्षेत्रों में बदली हो जाए और बम से घायल रहोगे तब मुझे याद कर लेना।